क्या सब याद रखा जाएगा?

हमने पिछले एक वर्ष में ना जाने कितनी बार जामिया के छात्र और कवि आमिर अज़ीज़ की इस कविता को सुना और दोहराया होगा जिसका शीर्षक "सब याद रखा जाएगा" है, इस बीते हुए वर्ष में ये कविता एक तरह का प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरा है, जिसको हम बड़े गर्व के साथ अपने-अपने टाइमलाइनों और स्टोरीज पे शेयर करते हैं और ये सोचते हैं कि सामने वाला चाहे जितना भी अत्याचार कर ले, अपना समय आने पर हम सब याद रखेंगे, जिसमे कोई ग़लत बात है भी नहीं चूंकि ये संसार का ही नियम है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा, इंसान को अपने किए की सज़ा अवश्य ही मिलती है और मिलनी भी चाहिए। 
लेकिन अब सोचने वाली बात ये है कि क्या हम भी इतने नीच हो जाएंगे जब हमारा समय आएगा? 

किसी यूनिवर्सिटी में घुस के उसके छात्रों को मारने के बाद उनपर ही कार्यवाही करवा सकते हैं? 


क्या हम भी किसी छात्र के कमरे में आंसू गैस के गोले फेक सकते हैं? 

किसी निर्दोष का हाथ बर्बाद कर सकते हैं? 
किसी लाइब्रेरी में पढ़ते हुए छात्रों पे लाठियां बरसा सकते हैं?

 किसी के मात्र प्रदर्शन करने के तरीके को बताने को देशद्रोह कहलवा सकते हैं? 
कड़ाके की सर्दी में अपने हक़ की आवाज़ के लिए बैठी औरतों को ५०० रुपए में बिकी हुई कह सकते हैं? 
क्या न्यूज़ चैनलों से दलाली करवा सकते हैं? 
किसी पे झुटा आरोप लगाकर उन्हें गद्दार बुला सकते हैं, 
 और फिर मासूम लोगों के घरों को उजाड़ सकते हैं?
 

जवाब सिर्फ एक ही होगा, नहीं। 

हम इनमें से या और जो भी अत्याचार उन्होंने किया है उनमें से कुछ भी वापस उन पर नहीं कर सकते हैं। फिर क्यों याद रखा जाए? ये ढोंग हम क्यों कर रहे हैं? हम खुद को कौनसा दिलासा दे रहे हैं? सोचने की बात ये है कि "अत्याचार हो या अत्याचारी" ये दोनों कोई नया आविष्कार नहीं है इस दुनिया के लिए, हम जिस भी इतिहास की किताब के पन्नों को उलट लें हमें कोई ना कोई अत्याचारी दिख जाएगा अत्याचार करते हुए, अब चाहे एक उदाहरण मिस्र के पुराने समय के ज़ालिम और घमंडी बादशाह फिरौन का ही ले लें, खुद को खुदा तक समझने लग जाने के बाद भी, फिर क्या हश्र हुआ उसका ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है, अत्याचारी या उसका घमंड, कोई भी ज़्यादा दिन तो ऐसे भी नहीं टिकने वाले तो वो हमारी मुख्य चिंता का विषय नहीं होनी चाहिए लेकिन ये होना चाहिए कि ऐसे खुद को अंधेरे में रखना के सब " याद रखा जाएगा" से क्या फायदा होने वाला है और हम कुछ ऐसा क्यों नहीं करते हैं की उन्हे हमे याद रखने पे मजबूर होना पड़े, चाहे कोई छोटा सा ही क़ानून बनाना हो लेकिन वो हमे नज़र अंदाज़ ना कर पाएं।  हमारा प्रधितिनित्व क्यों नहीं है वहां? और यहां पर "हम" से मतलब, सिर्फ किसी खास धर्म, जाति या श्रेणी से नहीं है बल्कि हर आदमी से है जिसपे अत्याचार हुआ है या हो रहा है। अत्याचार को सहना भी अत्याचार है तो क्यों याद रखने के लिए सहा जाए? क्यों नहीं उन्हे अत्याचार करने से पहले ही रोककर उन्हीं की मदद की जाए। क्यों नहीं पढ़कर आगे आया जाए, कदम से कदम मिलाकर उनके कदमों को लड़खड़ाने से रोका जाए। 

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